कहमुकर सत्ता पाएं।

cartoon
कौन कहता है कि भारत खेलों के मामले में पिछड़ा है? भाई मैं तो ऐसा नहीं मानता, मगर किसी को भी लगता है कि इस मामले में भारत फिसड्डी है तो उनकी सोच गलत है। दरअसल बात ये है कि ये जो विश्व चैंपियन खेल है ना, वहां हमारे देश के मुताबिक खेल ही नहीं रखे गए हैं. एक बार विश्व चैंपियन खेल वैसे करा के दिखा दो, जैसा हम चाहते हैं तो कसम देश के प्रधानमंत्री की, एक भी मेडल पर कोई विदेशी हाथ लगा ही नहीं पाएगा। हर बार पदक तालिका में सबसे ऊपर रहने वाला चीन, जापान और अमेरिका चारों खाने चित दिखंेगे। मान लीजिये कि गाय मारना कोई खेल होता तो क्या कोई जोर है पूरी दुनिया में अपने बीजेपी के उन्मादीयों का… नहीं ंना! खैर, अब आइये धरना देना कोई गेम होता तो है कोई जोरीदार पूरे विश्व में अपने केजरीवाल जी का… नहीं ना, तो आइये देखते हैं ऐसे कौन कौन से गेम हैं? और जरा विचार करते हैं कि अपने देश से कौन कौन से खेल विश्व चैंपियन खेल में जाने लायक है और हमारे देश से उस खेल में स्वर्ण पदक पर अपना कब्जा जमाने कौन सा महानुभाव जाऐगा? पहला लुका छिपी का खेल, ये खेल तो बहुत से भारतीयों का पसंदीदा खेल है। अगर इस खेल में भारत से किसी को भेजे जाने की बात हो, तो कई लोग शार्टलिस्ट होंगे, पर दो लोग ही ऐसे हैं, जो इस खेल में देश को पक्का गोल्ड दिलवा सकते हैं, पहला ‘विजय माल्या’ और दूसरा मोदी का। अरे गलियाइए मत मैं नरेंद्र मोदी की नहीं उसका सखा नीरव भाई उर्फ ‘नीरव मोदी’ की बात कर रहा हूं। फिर आप विदक गए, नीरव मोदी को हमारे प्रधानमंत्री ने ही भाई कहा है और अरबों रूपये का सरकारी बैंकों को चपत लगा देश से बाहर भागते समय सभी एजेंसियों को…. विश्वास कीजिये, इस खेल में दोनों ही मंझे हुए खिलाड़ी हैं। जी अगला पतंगबाजी का खेल, इस खेल का तो हमारे देश में बड़ा जबरदस्त क्रेज है भाई। इस खेल में जो भारत से दो लोग जाएंगे उसमें पहले तो हमारे भाईजान ‘सलमान खान’ होंगे, जिन्होंने पतंग ऐसी उड़ाई कि उनके सारे केस कट गए और दूसरे खिलाड़ी इस खेल के लिए वे होंगे जिनके साथ सलमान ने पतंग उड़ाई थी, प्रधानमंत्री ‘मोदी जी’। नाव नेक्सट गिल्ली डंडा का खेल, ये खेल थोड़ा गांव देहात से जुड़ा हुआ है, तो इसके लिए कोई ऐसे खिलाड़ी चाहिए, जो फुर्ती के साथ इसको आसानी से खेल सके। वैसे तो ये हमारा बनाया खेल है, लेकिन फिर भी इस गेम में देश का सबसे अच्छा खिलाड़ी कोई जायेगा, तो वो हैं हमारे ‘नवजोत सिंह सिद्धू’। इस गेम के चैंपियन खिलाड़ी हैं सिद्धू साहब। बोलते वक्त भी उनके हाव भाव से ऐसा ही लगता है कि वो गिल्ली को डंडे से मार रहे हैं। अगला खेल चोर-सिपाही, इस गेम के भी हमारे देश में बहुत खिलाड़ी हैं, पर सब पर विश्वास तो नहीं कर सकते ना, इसलिए जिस बेस्ट खिलाड़ी को हमने इस गेम के लिए चुना है, वो है ‘संजय दत्त’। इतनी बार उन्होंने जेल से अंदर बाहर का खेल खेला है कि सब उनको चैंपियन मान चुके हैं। अगला गूंगी का खेल, इस गेम में कुछ ऐसा नियम होता है कि सामने वाले को चुप रह कर अपने टीम मेंबर्स को सब समझाना होता है। ये गेम तो हमारे लिए बाएं हाथ का खेल है। इसके जो चैंपियन हैं, उनको चैंपियन सिर्फ हम ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया मानती है और वे हैं हमारे पूर्व प्रधानमंत्री ‘डॉ. मनमोहन सिंह’ जी। सच मानिये, उनसे बढ़िया कोई ये गेम खेल ही नहीं सकता। जी अब आते हैं कंचे का खेल पर, ये खेल थोड़ा आसान है, तो इसके लिए कोई मंजा हुआ खिलाड़ी होना चाहिए, तो इस खेल के लिए भारत से जो खिलाड़ी जाएगा, वो हैं ‘सुब्रह्मण्यम स्वामी’। गजब का टैलेंट है भाई इनमें, एकदम सटीक निशाना लगाते हैं। इस उम्र में भी इनकी इस क्षमता का कोई जवाब नहीं है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी से लेकर कई लोगों को अपने निशाने पर ले चुके हैं स्वामी जी। चलो चलते हैं लम्बी कूद खेल की ओर, बचपन में खेले जाना वाला ये खेल बड़ा मजेदार था। इसमें आपको कूद कर सबसे आगे निकल जाना होता था। ओलंपिक में इस खेल के शामिल होने के बाद कोई इस खेल में देश को जीता सकता है तो वो हैं ‘ललित मोदी’। बहुत ऊँची छलांग लगाते हैं ये। घोटाले की पोल खुलने के बाद ऐसी छलांग लगायी कि आज तक किसी के हाथ नहीं आए। खो-खो, ये खेल तो आपने बचपन में जरूर ही खेला होगा। खेल के दौरान पोल को छू कर वापस आना होता है, तो इसके लिए कोई ऐसा खिलाड़ी चाहिए जो यू टर्न लेने में मास्टर हो। अब तो समझ में आ ही गया होगा आपको कि हम इसके लिए किसे भेजने की बात कर रहे हैं? जी इस गेम में भारत को अगर कोई आदमी गोल्ड दिलवा सकता है तो वो हैं ‘अमीत शाह’ जी और ‘बाबा रामदेव’। पूरे देश में इनका नाम फेमस है। कुछेक मौकों पर ये अपनी काबिलियत भी दिखा चुके हैं। कूदा-फानी, यह खेल काफी हद तक जिमनास्टिक से मिलता जुलता है। इसमें भी अपने शरीर की फुर्ती दिखाना होता है तो इसके लिए किसी ऐसे इंसान की जरूरत होगी जिसका शरीर रबड़ की तरह फ्लेक्सिबल हो। फिर तो इस खेल के लिए एक ही नाम सामने आता है, भोगगुरु ‘बाबा कामदेव’ नहीं भाई योगगुरु ‘बाबा रामदेव’ का। चाहे योग कलाएं हों या लड़की के कपड़े पहन कर कूद के भागना हो, बाबा हमेशा आगे ही रहें हैं। बाबा तो सोना लेकर ही आएंगे इसमें पक्का। अब जरा बात कर लें खेल पकड़म-पकड़ाई की, इस गेम में कुछ ऐसा होता है कि कोई एक खिलाड़ी बाकियों को पकड़ता है और जीत जाता है। इस खेल में हमारे देश से जो खिलाड़ी जा रहा है, उसे इतनी मेहनत करनी ही नहीं पड़ती. इसको लोग आकर खुद पकड़ लेते हैं और उठा कर इधर उधर घुमाते रहते हैं। अपना नीतिश जी से अच्छा ये खेल कौन खेल सकता है? अभी हाल में ही बिहार में मोदी, मांझी और लालू के साथ ये गेम खेल कर अपनी काबिलियत दिखा चुके हैं। मुजफ्फरपुर वाले केस में भी ये लगभग विजयी ही रहे हैं। कई गेम तो ऐसे भी हैं जिनमें हमारे खिलाड़ी पूरी दुनिया को धूल चटा सकते हैं पर क्या करें, ये विश्व चैंपियन खेल वाले हमारे देसी टैलेंट को कभी समझ ही नहीं पाएंगे। अगर इन खेलों को विश्व चैंपियन खेल में शामिल कर लिया गया, तो कसम से एक भी सोना फिरंगियों के हाथ नहीं लगने देंगे। बाकी अगर आपकी नजर में भी कोई खेल है और उससे जुड़ा हुआ कोई खिलाड़ी है, तो हमें जरूर बताएं। वैसे भी आज कल ये सभी महारथी चुनाव रूपी महाखेल में व्यस्त हैं फिर से ये लोग पुरानी वादों के ताबूत को दवा कर नया दिग्भ्रमित करने वाले वादों को गढ़ कर सत्ता सुख की तैयारी में हैं पर क्या मैं इनको पुरानी वादों का याद नहीं दिलाऊँगा? जरूर दिलाऊँगा। आप भी थोडा समय निकाल कर इनके पुराने वादों पर नजर डालें। आइये हम सत्तानसीन मोदी जी के पुराने वादों पर नजर डालते हैं। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी के 52 पन्नों का यह दस्तावेज सुशासन और समेकित विकास देने का वादा करते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ को नारा बनाया था। घोषणा-पत्र समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने ब्रैंड इंडिया पर जोर देते हुए इसे 21वीं सदीं की स्वदेशी अवधारणा बताया था। बीजेपी के घोषणा-पत्र में कहा गया था कि संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के रूप में दर्ज की गई थी।
बीजेपी का कहना था कि जब तक भारत में समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता तब तक लैंगिक समानता कायम नहीं हो सकती है। समान नागरिक संहिता सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करती है। बीजेपी सर्वश्रेष्ठ परंपराओं से प्रेरित समान नागरिक संहिता बनाने को प्रतिबद्ध था जिसमें उन परंपराओं को आधुनिक समय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जाएगा। बीजेपी ने अपने घोषणा-पत्र में स्पष्ट कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली धारा 370 को हटाने के अपने दृष्टिकोण पर पार्टी कायम है और रहेगी। इसमें कहा था कि बीजेपी कश्मीरी पंडितों की उनके पूर्वजों की भूमि पर ससम्मान, सुरक्षित और आजीविका के साथ वापसी कराएगी। घोषणा-पत्र में रामसेतु को देश की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग बताया था और थोरियम के भंडारों की वजह से भी इसके सामरिक महत्त्व को माना गया था। बीजेपी ने कहा था कि ‘सेतु समुद्रम् परियोजना’ पर फैसला लेते समय वह इन तथ्यों पर विचार करेगी। यूपीए-1 और यूपीए-2 के शासनकाल में पैदा हुई अव्यवस्थाओं का प्राथमिकता से हल निकालने के लिए वह त्वरित और निर्णायक कदम उठाएगी। अल्पसंख्यकों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और उद्योगों में इनके लिए सुविधाएं दिलाने का वादा भी किया गया था। पार्टी ने समान अवसर वाले भारत की वकालत की थी। बीजेपी यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध थी कि भारत के विकास में सभी समुदायों की समान भागीदारी होनी चाहिए। इसमें कहा गया था कि, हमारा विश्वास है कि अगर कोई समुदाय पीछे छूट गया तो भारत प्रगति नहीं कर सकता। काले धन के बारे में
घोषणा-पत्र में कहा था कि हमारी सरकार आने पर भ्रष्टाचार की गुंजाइश न्यूनतम करते हुए ऐसी स्थिति पैदा करेगी कि काला धन पैदा ही नहीं हो पाये। वादा यह भी किया था कि आने वाली बीजेपी सरकार विदेशी बैंकों और समुद्र पार के खातों में जमा काले धन का पता लगाने और उसे वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। बीजेपी ने ऐसा कार्यतंत्र बनाने की बात की थी जिसमें आपसी रिश्ते सद्भावपूर्ण हों और हर राज्य की स्वाभाविक परेशानियां व्यापक रूप से निपटाई जा सके। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि टीम इंडिया प्रधानमंत्री के नेतृत्व में दिल्ली में बैठी टीम नहीं होगी बल्कि मुख्यमंत्रियों और दूसरे अधिकारियों को भी इसमें समान भागीदार बनाया जाएगा। तेज रफ्तार बुलेट ट्रेनों का जाल बिछाने के लिए एक महत्त्वाकांक्षी हीरक चतुर्भुज रेल परियोजना शुरू करने का ऐलान किया था। खुली सरकार और जवाबदेह प्रशासन के वादे के साथ घोषणा-पत्र में कहा था कि प्रशासनिक सुधार बीजेपी की प्राथमिकता होगी व सत्ता में आने पर बीजेपी सरकार इसका क्रियान्वयन प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत एक उचित संस्था के जरिए करेगी। इसका उद्देश्य सरकार की निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना होगा। चुनाव सुधारों की बात करते हुए पार्टी ने कहा था कि सत्ता में आने पर वह अपराधियों को राजनीति से बाहर करने और विधानसभाओं तथा लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने हेतु एक तंत्र विकसित करने के लिए दूसरे दलों के साथ विचार-विमर्श करेगी। उसका कहना था कि इससे सरकार और राजनीतिक दलों का खर्च कम होंगे और राज्य सरकार में स्थिरता आएगी। खाद्य सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए घोषणा-पत्र में कहा था कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि इस योजना का लाभ आम आदमी तक पहुँचे और भोजन का अधिकार सिर्फ कागजों पर बना एक कानून या राजनीतिक नारा न रहे। खेलकूद में भारत के अच्छा प्रदर्शन नहीं करने की शिकायत करते हुए बीजेपी ने घोषणा-पत्र में एक राष्ट्रीय खेलकूद प्रतिभा खोज प्रणाली शुरू करने की बात कही थी। यह भी कहा गया था कि इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए संगठित तरीके से निवेश करने की जरूरत है। सत्ता में आने पर तमाम खेलों (पारंपरिक और आधुनिक) का समर्थन करेगी। महिलाओं के सशक्तिकरण और कल्याण को उच्च प्राथमिकता देने की बात कहते हुए घोषणा-पत्र में कहा गया था कि बालिका समृद्धि, लाडली, लक्ष्मी और चिरंजीवी योजना जैसी पहले की सफल योजनाओं की सर्वोत्तम बातों को शामिल करके एक व्यापक योजना तैयार की जाएगी जिससे कन्याओं के प्रति परिवारों में सकारात्मक प्रवृति विकसित हो। घोषणा-पत्र में हर घर, हर खेत और हर कारखाने को पानी उपलब्ध कराने का वादा करते हुए कहा था कि हर खेत को पानी देने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ग्राम सींचाई योजना का शुभारंभ किया जाएगा। निर्मल गंगा और नदियों को जोड़ने के अपने पिछले रुख में बदलाव करते हुए पार्टी ने कहा था, व्यावहारिकता के आधार पर नदियों को आपस में जोड़ने पर विचार होगा। यूपीए सरकार की टैक्स नीति को टैक्स आतंकवाद का नाम देते हुए बीजेपी का कहना था कि अनिश्चितता बढ़ाने का इसने काम किया है जिसके कारण व्यापारी वर्ग में हताशा आई है और निवेश के वातावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और इससे देश की साख पर बट्टा लगा है। पार्टी ने सत्ता में आने पर कर प्रणाली को तार्किक और आसान बनाने, विवादों के निपटारे के लिए तंत्र विकसित करने का वादा किया था। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बारे में कहा था कि मल्टी ब्रांड खुदरा निवेश में वह एफडीआई का समर्थन नहीं करेगी और एफडीआई की केवल उन्हीं क्षेत्रों में अनुमति दी जाएगी जहां नौकरी और पूंजी का निर्माण हो सके या जहां आधारभूत ढांचे के लिए तकनीकी और विशेषज्ञ ज्ञान की आवश्यकता हो। पार्टी छोटे और मंझौले दुकानदारों के हित संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। याद रहे 2014 में बीजेपी की सरकार वादों पर सवार होकर आई। चुनाव से पहले बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने वादों और दावों की झड़ी लगा दी थी। कायदे से विपक्ष को पूछना चाहिए कि बीजेपी के घोषणा-पत्र में ऐसा बहुत कुछ है जिस पर अब तक काम शुरू ही नहीं हुआ लेकिन विपक्ष ने अब तक घोषणा-पत्र का अध्ययन और हकीकत के साथ उसे मिला कर देखने का काम शुरू ही नहीं किया है। विपक्ष की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि विपक्ष में कितने सांसद हैं। सरकार अगर अपने चुनावी वादे पूरा नहीं करती तो इसे जनता की नजर में लाने का दायित्व विपक्ष का है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष की भूमिका को काफी महत्त्वपूर्ण माना गया है लेकिन यह तभी संभव है जब वह अपनी भूमिका को समझे और उसे निभाए। अगर विपक्ष भी
सत्ताधारी दल के चुनाव घोषणा-पत्र पर नजर नहीं रखती तो यह काम कौन करेगा? लेकिन अफसोस; चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बन गया है और राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्र व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट! और आज इन पैम्पलेट, माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण से लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी, गेहूँ और पेट्रोल तक पंहुँच गई। कब तक घी और पेट्रोल से बुझाई जाएगी आग? कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे? सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं। राजनीतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी है। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया? जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 रूपये से ज्यादा का कर्ज क्यों है? जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डॉलर के बराबर था तो आज वह 70 रुपए के स्तर पर कैसे पहुँचा? हमारा देश कृषी प्रधान है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा क्यों? चुनाव दर चुनाव, पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं? क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानी, गरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं? देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया? और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा न करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं? यह वाकई एक गंभीर मसला है। जो वादे राजनीतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं? चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को ‘चुनावी जुमले’ कह देती हैं। यहां समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं। आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे? आखिर सभी तो एक से ही हैं। जी, उसने अलग अलग पार्टी को चुन कर देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे। पार्टी और नेता दोनों ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़े हैं। क्यों? क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है। मुद्दा वादों को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही बनाए रखने का है। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनीतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बाद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं करती है उसे अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दे। जब तक इन
राजनीतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस हद तक नीचे ले जाएंगे इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है। मेरा तो काम था आपको आपके सरकार की पुराने वादों को आपके सामनें रखने का। निर्णय आपको लेना है कि आप सवाल पुछेंगे या फिर आप भी पुराने वादों पर मिट्टी डाल कर आगें बढ़ेंगे। वैसे भी आप राजा हैं निर्णय लेने वाला। ये तो राजनीति के खिलाडी हैं, खेल खेलेंगे ही। भले ही वह खेल आपकी भावनाओं के साथ क्यों न खेला जा रहा हो।

0 Comments

Leave a Comment

Login

Welcome! Login in to your account

Remember me Lost your password?

Don't have account. Register

Lost Password

Register