मातृत्व के अधिकार से 5 हजार महिला बंचित

Untitled-4

अपने बचपन के दिनों से हम यह सुनते आ रहे हैं कि गरीबी सबसे बड़ा पाप है। यह आदमी से क्या कुछ नहीं करवा लेती। और इसके साथ ही यह भी हम सुनते आए हैं कि पैसे में सारी ताकत है। ….और जब इस पैसों के स्वार्थ के सामने किसी की गरीबी, मजबूरी और लाचारी आती है तो ये पैसे वाले इसका किस हद तक गलत फायदा उठाते हैं, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। स्वतंत्र भारत के इतिहास में भी गरीबों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं हुई है। उनका आज भी जमकर शोषण होता है। कभी उसे बंधुआ मजदूर बना लिया जाता है तो कभी उसके अंगों को निकालकर या तो बेच लिया जाता है या फिर पैसे वाले अपने फायदे के लिए उसका उपयोग कर लेते हैं। डाक्टरों, बिचैलियों और पैसे वालों के मिलीभगत से किडनी के बिकने की खबरों से तो आप आए दिन रू-ब-रू होते रहते हैं। इसके साथ ही लीवर, हर्ट आदि महत्त्वपूर्ण अंगों के स्माॅगलिग के बारे में तो आपने कई घटनाओं को सुना ही है पर यहां हम आपको एक ऐसी घृणित घटना से परिचित करा रहे हैं जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। आप यह सोचने के लिए विवश हो जाएंगे कि क्या ऐसा भी हो सकता है? ….और यह कहां तक उचित है? क्या इससे मानवता शर्मसार नहीं हुई? इस बात से सभी को इत्तफाक होगा कि मातृत्व हर महिला का जन्मसिद्ध अधिकार है। बच्चे खेल खेल में ही अपने घर-परिवार और बच्चों का सपना संजोने लगते हैं। और खास कर यदि लड़कियों की बात करें तो वह चाहे मेरी, आपकी या फिर अन्य किसी की बेटी जब थोड़ी बड़ी होती है तो वह भी अपने इस सुनहरे सपने को अपने मन में बारीकि से संजोने लगती है और इसकी कल्पना मात्र से ही वह अपने मन में सुखद अनुभूति का अनुभव करती है। पर यदि आपको पता चले कि किसी के इस सुनहरे सपने के साथ किसी ने भद्दा खेल खेला है तो कैसा लगेगा? क्या इसे आप अमानवीय कृत्य का नाम नहीं देंगे? और उसमें भी यदि यह पता चले कि अपने ही देश के किसी भाग में उसे उसके इस जन्मसिद्ध एवं सुखानुभूति के अधिकार से एक सोची समझी साजिश के तहत महरूम कर दिया गया तो कैसा लगेगा? जहां तक मुझे उम्मीद है कि निश्चय ही आपको भी बिजली के हजारों बोल्ट के करेंट जैसा महशूश होगा और आपका दिमाग सन्न रह जाएगा। लेकिन यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि इस घटना को स्वतंत्र भारत में आज के दौर में अंजाम दिया गया है। घटना महाराष्ट्र के बीड जनपद की है। इसमें घटना में हजारों भोली-भाली युवतियों के गर्भाशय को डाॅक्टरों ने निकाल दिया है और वह भी किसी दूसरे के ईशारे पर। लेकिन इन युवतियों को इस बात का भनक तक नहीं लगा कि उसके साथ क्या हुआ? पर ऐसे में इस घटना को देखते हुए निश्चय ही यह कहना उचित होगा कि महिला मजदूरों का शोषण चरम पर है। यह स्थिति जमींदारी और अंग्रेजी शासन के दौरान थी या नहीं हमें कुछ पता नहीं, मगर वर्तमान दौर में महाराष्ट्र में हजारों महिलाओं का गर्भाशय निकाले जाने का यह कड़वा सच न केवल दिल दहला देने वाला है बल्कि हैरतअंगेज और मानवता को शर्मसार करने वाला भी। ….और सबसे बड़ी बात यह कि इस घटना को पिछले तीन सालों यानि 2016 से लगातार अंजाम दिया जा रहा था मगर स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य प्रशासन के आला अधिकारियों एवं विधायकों और मंत्रियों तक को नहीं थी। लेकिन हाल के दिनों में गर्भाशय निकाले जाने की इस घटना को राज्य सरकार के स्वास्थ्यमंत्री ने विधानसभा में स्वीकार किया है। घटना महाराष्ट्र के बीड जनपद की है जहां पिछले तीन साल में सरकारी आंकड़े के अनुसार 25 से 30 साल के बीच की 4,605 महिलाओं के गर्भाशय निकाले जाने का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है और इस बात की जानकारी खुद महाराष्ट्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने गत 18 जून 2019 को विधान परिषद में पूछे गए एक प्रश्न के जबाव में दी। बता दें कि हजारों मजदूर महिलाओं के गर्भाशय धोखे से निकाले जाने का मामला इसी वर्ष अप्रैल में तब सामने आया, जब कुछ अखबारों में छपी खबरों के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जिसके बाद बीड के सिविल सर्जन की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित कर मामले की जांच कराई गई थी, उसी में यह सामने आया कि यहां के तकरीबन 99 प्राइवेट अस्पतालों में पिछले तीन सालों के दौरान 4605 महिलाओं के गर्भाशय बिना बताये निकाल दिये गये हैं। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद प्राथमिक तौर पर की जांच के रिपोर्ट के मुताबिक इन हजारों जवान महिलाओं के गर्भाशय सिर्फ इसलिए निकाल दिये गए ताकि गन्ना कटाई के दौरान उन्हें माहवारी की समस्या का सामना न करना पड़े और न ही वे गर्भ धारण कर पायें ताकि ठेकेदारों का काम बाधित न हो। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यदि इस मामले का सही से और निष्पक्ष जांच कराई जाय तो यह संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है जो सरकारी आंकड़ों में बताया गया है क्योंकि बीड जनपद में बहुत बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है और यहां गरीबी भी चरम पर है। गौरतलब है कि इस घटना को अंजाम देने में प्राइवेट डाॅक्टरों के साथ पैसे वालों के बीच की आपसी सांठ-गांठ जिम्मेदार है, जैसा कि अब तक अंगों की तश्करी के मामले में होता आया है। कितना शर्मनाक है कि ये वही डाॅक्टर होते हैं जिन पर समाज को स्वस्थ रखने और संतानोत्पत्ति की समस्याओं से जूझ रहे दम्पितियों की समस्याओं को दूर करने की जिम्मेदारी है और उसी ने इस अमानवीय घटना को दिल खोलकर अंजाम दिया है। मीडिया मे आ रही खबरों के मुताबिक बीड जनपद में 99 प्राइवेट अस्पतालों में 2016-17 से 2018-19 के बीच 25 से 30 वर्ष के बीच की 4605 महिलाओं की अज्ञानता का लाभ उठाकर उनका गर्भाशय निकाल दिया गया, ताकि ये महिलाएं गर्भ धारण न कर पायें और ऐसी स्थिति में गन्ना कटाई का काम बाधित न हो। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने विधान परिषद में हजारों महिलाओं के गर्भाशय निकाले जाने की जानकारी देते हुए कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित एक समिति गठित की गई है जो बीड जिले में गर्भाशय निकालने के मामलों की निष्पक्ष जांच करेगी। इस बाबत हमने जब उनसे उनके कार्यालय वाले टेलिफोन नंबर पर संपर्क करने की भरपूर कोशिश की लेकिन खबर लिखने तक उनसे कोई बात नहीं हो पाई। हालांकि उनके मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने के शर्त पर यह स्वीकार किया कि घटना सही है और आंकड़ों में इज़ाफा भी हो सकता है बशर्ते सही से जांच की जाय और मजदूरी करने वाले हर परिवार से संपर्क कर उसके साथ सहानुभूति जताते हुए आत्मीयता के साथ बात की जाय। यदि खानापूर्ति करानी है तो फिर बात ही कुछ और है। इस बाबात जब हमने वहां के स्थानीय पत्रकारों के माध्यम से लोगों से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया तो पहले तो अधिकांश लोग इस पर कुछ भी बोलने से इंकार किए लेकिन जब हमने उन्हें काफी भरोसा दिलया और यह बताया कि हम दिल्ली से बोल रहे हैं और आपकी समस्या के निदान की दिशा में काम करने का प्रयास करेंगे तब कहीं जाकर उनमें से कुछ ने अपना मुंह खोला। शांता (परिवर्तित नाम) जिसने अपनी उम्र 28 बताई, पानागांव इलाके की रहने वाली है और उसके साथ यह घटना घटी है। उसने बताई कि गन्ना काटने के दौरान मुझे पिछले साल एक दिन मुझे अचानक से पेट में काफी जोर का दर्द महशूश हुआ और मैं काम नहीं कर पा रही थी। वहीं खेत की मेंढ़ पर जाकर लेट गई और दर्द से छटपटा रही थी। लगभग आधे घंटे बाद ठेकेदार के बेटे ने मुझे जब छटपटाते हुए देखा तो वह अपनी मोटरसाईकिल पर बिठा कर मुझे एक नर्सिंग होम में ले गया जहां ठेकेदार भी पहुंच चुका था और उनसे बात करने के बाद डाक्टरों ने मुझे भर्ती कर लिया। डाक्टर ने मुझे नींद की सूई लगाई और उसके बाद मेरे साथ क्या हुआ यह मुझे पता नहीं चला। दूसरे दिन सबेरे जब मेरी नींद खुली तो पेट के नीचले भाग में पट्टी बंधा पाई और वहां दर्द भी हो रहा था। पूछने पर नर्स ने बताई कि मेरा एक छोटा सा आॅपरेशन हुआ है और अब मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊँगी। मेरे परिवार के लोग भी वहां मौजूद थे पर उन्हें भी इस बात का पता नहीं था कि मेरा आॅपरेशन क्यों हुआ और किस चीज का था। करीब एक सप्ताह बाद मुझे वहां से छुट्टी मिल गई। हालांकि इस दौरान जितने दिन काम पर नहीं गई थी उसका भी पैसा ठेकेदार ने मेरी मां को दिया लेकिन उसकी इस उदारता को हम नहीं समझ पाए। मुझे पूरी तरह से ठीक होने और काम पर वापस लौटने में लगभग एक महीने लग गए। पर इस बात मुझे तब पता चला कि मेरा बच्चेदानी निकाल दिया गया है जब अगले तीन-चार महीने तक मुझे महीना नहीं हुआ। पहले दो महीने तक तो मैंने यह सोचा कि आॅपरेशन में बहुत खून निकल गया होगा इसलिए नहीं हुआ और साथ ही दवाई भी चल रही है। लेकिन यह सिलसिला जब लगातार चलने लगा तो चैथे महीने मैं अपनी भाभी के साथ अपने कस्बे की एक महिला डाॅक्टर के पास गई जिसने कुछ जांच करने के बाद इस बात का खुलाशा की कि मेरे आॅपरेशन के दौरान बच्चादानी निकाल दी गया है। हालांकि मेरे साथ काम करने वाली और भी चार लड़कियों और औरतों के इस तरह का हो चुका था तो मैं सारा खेल समझ गई। लेकिन हम गरीब लोग हैं साहब और वे पैसे वाले। हमें अपने भाई-बाप को सही सलामत देखना है तो उसके खिलाफ मुंह नहीं खोल सकते। वे कुछ भी कर सकते हैं। पुलिस भी उन्हीं लोगों को साथ देती है, हम गरीबों को नहीं। मैं और मेरे परिवार वाले मजबूर थे चुप रहने को। हालांकि भैया को जब पता चला तो वह पुलिस में जाने की बात करने लगा पर हम सभी ने उसे शांत कराया क्योंकि इससे कुछ हमें मिलने वाला था नहीं उलटे भैया और पापा के जान को खतरा हो सकता था। आप चुंकि दिल्ली से हैं इसलिए सारी बात बता रही हूं। अब क्या कर सकती हूं, जो होना था हो गया। अब मैं जीवन में कभी मां नहीं बन सकती इसलिस शादी भी करने का मन नहीं करता लेकिन समाज में रहना है तो उसके नियमों को तो एक न एक दिन मानना ही पड़ेगा। आखिर कब तक अपने जिद पर अड़ी रह सकती हूं। शांता और इसकी जैसी उन तमाम महिलाओं एवं औरतों के दर्द को इनके शब्दों में बखूबी समझा जा सकता है पर सवाल यह उठता है कि जो काम घरल्ले से पिछले तीन सालों से चल रहा था उसकी भनक प्रशासन को क्यों नहीं लगी। इस बाबात जब हमने बीड जिले के कुछ थानाधिकारियों से संपर्क किया तो उनमें से अधिकांश का जबाव वही जाना पहचाना और घिसापिटा कि जब तक हमारे पास कोई शिकायत लेकर आएगा नहीं तो मैं कैसे और किस पर कार्रवाई करूँ? लेकिन जब हमने डीएम आॅफिस से संपर्क किया तो वहां के एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि इस तरह का मामला प्रकाश में आया है और डीएम कार्यालय की ओर से जांच कराई जा रही है और प्रभावित महिलाओं के साथ न्याय होगा इसमें कोई शक नहीं। हालांकि जिस समय हमने डीएम आॅफिस में सपर्क किया था उस समय डीएम जिले में किसी विशेष प्रयोजन से बाहर गए हुए थे लेकिन मेरे काफी अनुरोध करने पर भी उस अधिकारी ने डीएम आस्तिक कुमार पांडे का मोबाईल नंबर नहीं दिया ताकि मैं उनसे सीधा संपर्क कर सकूँ। इधर स्वास्थ्य मंत्री ‘शिंदे’ ने विधान सभा में जो घोषणा की उसके अनुसार इस मामले की जांच करने वाले पैनल में मुख्य सचिव की अगुवाई में 3 गाइनोकोलॉजिस्ट और कुछ महिला विधायक शामिल होंगी। समिति को दो महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करनी है। इधर चर्चा के दौरान शिवसेना विधायक नीलम गोर्हे ने इस मुद्दे को खतरनाक बताते हुए कहा कि बीड जनपद में गन्ने के खेत में काम करने वाली औरतों के गर्भाशय साजिशन प्राइवेट अस्पतालों में निकाल लिए गए ताकि माहवारी के चलते उनके काम में ढिलाई न आए और जुर्माना न भरना पड़े। ठेकेदारों एवं डाक्टरों के इस मिलीभगत का दायरा वे बीड से बाहर भी होने की संभावना से इंकार नहीं करते। उनका कहना है कि इसके जांच के दायरे को सिर्फ बीड तक सीमित न कर उसके पड़ोसी जिलों में भी बढ़ाना चाहिए ताकि सही संख्या का पता चल सके। गौरतलब है कि बीते तीन साल में बीड जिले में 4,605 महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए हैं। बीड जनपद के सिविल सर्जन की अध्यक्षता में गठित समिति के मुताबिक गर्भाशय निकालने के ऑपरेशन 2016-17 से 2018-19 के बीच 99 प्राइवेट अस्पतालों में किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक जिन महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए हैं, उनमें से कुछ गन्ने के खेतों में काम करने वाली मजदूर नहीं हैं। हजारों महिलाओं का गर्भाशय निकाले जाने की घटना सामने आने के बाद से महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी चिकित्सकों को आदेश दिया है कि वे अनावश्यक रूप से किसी भी महिला का गर्भाशय न निकालें। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस साल अप्रैल में यह मामला मीडिया के जरिये सामने आने के बाद राज्य के मुख्य सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। शिवसेना विधायक नीलम गोर्हे ने कहा ‘कितना अजीब है कि प्राइवेट डॉक्टर्स ने इतनी बड़ी संख्या में और हल्की सी बीमारी में भी महिलाओं का गर्भाशय उनके शरीर से अलग कर दिया। हैरत तो यह है कि जिन महिलाओं के गर्भाशय निकाले गऐ वे सभी गन्ना मजदूर हैं। यह जरूर कोई साजिश है।’ नीलम गोर्हे ने यह भी आशंका जताई है कि कॉन्ट्रेक्टर और डॉक्टरों की मिलीभगत से हजारों महिलाओं से मां बनने का अधिकार छीन लिया गया। इसके पीछे वजह महिलाओं को उनके पीरियड के चलते और गर्भवती महिलाओं को छुट्टी देना शामिल है। जब मजदूर महिलाओं का गर्भाशय ही निकाल दिया जायेगा तो न उन्हें माहवारी आयेगी और न ही वे गर्भ धारण कर पायेंगी, जिससे गन्ना कटाई का काम बाधित नहीं होगा। स्वार्थ में अंधे होकर इतनी बड़ी तादाद में महिलाओं को साजिशन मां न बन पाने का जुर्म किया गया है, जिसके लिए दोषियों को कतई नहीं बख्शा जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने इस बात से भी इंकार नहीं किया कि इनके गर्भाशय का किसी ऐसी धनाढ़्य महिल को चोरी छिपे प्रत्यारोपित कर दिया गया हो जो लंबे समय से बच्चेदानी की समस्या के कारण मां नहीं बन पा रही हो। हालांकि विज्ञान ने आज जिस ऊँचाइयों को छूआ है उसे देखते हुए इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। बहरहाल जो भी हो, इस अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया गया है और इसकी निष्पक्ष जांच विभिन्न आयामों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए तथा इसमें संलिप्त सभी दोषियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए।

0 Comments

Leave a Comment

Login

Welcome! Login in to your account

Remember me Lost your password?

Don't have account. Register

Lost Password

Register