चेहरा नहीं सोंच बदलो।

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भारत भाग्य विधाता कौन, आम आदमी, यह तो सदी का सबसे बड़ा जोक होगा। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि “किसी भी समाज को बर्बाद करने में सबसे बड़ा योगदान उस समाज के पढ़े लिखे, यूवा और बुद्धिजीवी वर्ग का होता है जो यह कहता है कि मुझे राजनीति से नफरत है। ऐसा कहकर वह अपने ऊपर अपने से कम काबिल लोगों को राज करने का अवसर दे देता है”। यह शब्द कहने को विरोधाभाषी जरूर है पर मेरी नजर में बिल्कुल सत्य भी। देखिए ना आज हमारे देश में प्रजातंत्र शब्द का मतलब विरोधाभाषी होता जा रहा है। चुनाव और पद मिलने के बाद नेता जीआगे बढ़ रहे हैं और जनता पीछे छूट रही है। पहले के नेता समाज में मूल्यों के लिए जीते थे और अब इसके मायने बदल रहे हैं। ऐसा सालों से चल रहा है। सत्ता हासिल करने के बाद जनता की भावनाएं नेताओं के लिए कोई महत्व नहीं रखती है। इसके चलते समाज भी पिछड़ती जा रही है। एक अच्छे नेता के लिए जरूरी है कि वह न केवल चरित्रवान हो बल्कि वह संघर्षशील, निडर, विपरीत परिस्थिति में लोगों को अपनी तरफ मोड़ने की शक्ति रखने वाला हो।एक अच्छे नेता का गुण है कि वह सबकी बात को अच्छी तरह सुने और संवाद बनाए रखे। उत्तेजित करने या अपमान करने वाली बातों से विचलित न हों बल्कि सहनशक्ति विकसित करें। आज पार्टियां और सरकारें बदलती हैं तो सिर्फ नुक्कड़ और चैराहों पर लगे इश्तिहार ही नहीं बदलते बल्कि सारे के सारे शहर का पोशाक बदल जाता है.आज आपके पास राजनीति में न होने का कोई विकल्प नहीं है, आपके पास केवल दो ही विकल्प हैं या तो आप राजनीति का हिस्सा हैं या आप राजनीति के शिकार हैं। परन्तु समस्या यह है कि ज्यादातर लोग राजनीति का हिस्सा न होने के कारण राजनीति के शिकार बने हुए हैं। आजअलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के सत्ता बदलने से चेहरा जरूर बदलीलेकिन रंग नहीं बदले. आज जो सरकार सत्ता में आती है वह अपनी विचारधारा या पार्टी के रंग में सरकारी संपत्ति को रंग देती है.आज हमारे राजनेता हमारी राजनीति और हमारे समाज को दर्शाते हैं. राजनीति सामाजिक और सांस्कृतिक विधाओं और विभिन्नताओं का स्पेस कम और पैसा कमाई का जरिया ज्यादा बन गया है.पहले शहर में राजनीति होती थी. अब शहरों की राजनीति होती है.क्या यह चिंता की बात नहीं है कि इतने बड़े देश में कोई राजनीतिक विकल्प न हो जो जरूरत पड़ने पर वर्तमान सत्तारूढ़ दल का स्थान ग्रहण कर सके? एक दल सफल होती है तो और नहीं सफल होती है तो भी; अच्छा लोकतंत्र वही होता है जिसमें वर्तमान का विकल्प हमेशा मौजूद रहे। अपना देश विकल्पों पर नहीं, सामने मौजूद चुनौतियों पर फैसला लेना जानता है।नेताओं में बाहुवली और जातिवादी दोनों राजनीति के लिए खतरनाक है यह कहना जरूरी है। ये दोनों ही लोगों को बाँटने की कोशिश करते रहे हैं और सत्ता की लालसा में किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसों को लगता है कि जमाना उनके हिसाब से चलता है। उन्हें इसका आभास नहीं कि बाहर बैठा चायवाला ज्यादा राजनैतिक बहस करता है। उसे समाज, राजनीति और अर्थ की समझ वास्तविकता से आती है, करोडों की कमाई कर सारी सुख सुविधाओं में रहकर ये लोकतंत्र की परिभाषा को आम आदमी को समझाते हंै, तो ये हजम नहीं होता।समाज आज राजनीति को अछूत जैसी नजर से देखती है। आज अपने घर में बच्चों को लोग पढ़ाते हैं और उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने की बात करते हैं। कोई भी अभिभावक या परिवार अपने बच्चे को यह नहीं कहता की मेहनत से पढ़ो तुम्हें राजनीति करना है। समाज को यह धारणा बदलनी होगी। भारत आज युवा शक्ति के मामले में दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध है। यह स्थिति भारत को विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण दिशा दे सकती है। यह सपना तभी पूरा होगा, जब देश, समाज युवाओं को प्राथमिकता देंगे। युवाओं को मौका देंगे और युवा विकास एजेंडा तय करने के लिए अपने आपको देश और राजनीति को समर्पित करेंगे।आज आपके पासपैसा हो सकता है, मगर उसे चलाने वाले कौन, उद्योगपति, मगर उनके भी हित कहीं और से सधते हैं। सही समझ रहे हैं। आप लकदक खादी में सजे, चेहरे पर लालिमा और माथे पर तमाम परेशानियों की वजह से कुछ सिलवटें लिए नेता ही तय करते हैं समय की रफ्तार। मगर नेता बनना इतना आसान तो नहीं। अगर आज कोई आम आदमी आपसे कहे कि मैं राजनीति में कैरियर बना रहा हूं तो आप उसे पागल या सनकी ही कहेंगे। सवाल है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, टीचिंग, मार्केटिंग आदि क्षेत्रों में कैरियर बनाया जा सकता है तो राजनीति में क्यों नहीं? यह सच है कि राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, लेकिन यह भी पूरी तरह सही नहीं है कि अगर इरादे सच्चे हों तो बाकी ज्यादातर क्षेत्रों में सिर्फ आप अपने लिए काम करते हैं जबकि राजनीति में कैरियर बनाकर आप देश की बेहतरी में योगदान दे सकते हैं और देशवासियों की सेवा कर सकते हैं। राजनीति में आने के बाद बेहद जरूरी कामों में है चुनाव लड़ना।मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की एक पंक्ति है
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…

राजनीति से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अच्छे लोगों का आना जरूरी है। यह बहुत सुंदर देश है। अच्छे लोग आएंगे, तभी हमारी भारत मां और सुंदर हो सकेगी। हमें लगता है कि राजनीति हमारेे बस का काम नहीं है, मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता, शायद मैं राजनीति में सफल नहीं हो पाऊँगा या यदि मैं राजनीति में गया तो मेरे काम धंधे का क्या होगा, क्या मुझे काम बंद करना पड़ेगा, ये तथा इसी प्रकार की बहुत सी बातें अकसर हमें राजनीति में आने से रोकती है। परन्तु जरा सोचिए; यदि अच्छे लोग इसी तरह राजनीति से दूर रहेंगे तो राजनीति में बुरे लोग ही आते रहेंगे तथा वे बुरे लोग अच्छे लोगों का शोषण ही करते रहेंगे जो आज हो रहा है।आज हम युवाओं को इसके प्रति ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है। हर छोटी और बड़ी घटनाओं पर मंथन करें तो सामने आता है कि ऐसा हम जिम्मेदारों का समाज से कट जाने के कारण होता है। यह भी हैरानी की बात है कि शिक्षा व्यवस्था में प्रजातंत्र जैसी बातों को काफी कम महत्व दिया जाता है। इसके कारण लोगों में इसके प्रति ज्ञान का अभाव भी समाज को कमजोर बना रहा है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि वे युवा जो नई सोच रखते हैं, समाज को आगे लेकर जाने की इच्छाशक्ति रखते हैं और ईमानदारी से वह सबकुछ करने का जिससे समाज में बदलाव आए; उन्हें आगे आना चाहिए। युवा ही इसकी दिशा बदल सकते हैं। अच्छी पढ़ाई और ज्ञानवान यूथ को इसके प्रति सोचना होगा। सत्ता का मोह छोड़कर जनता और समाज के हितों के बारे में सोचना होगा। इसके बाद समाज में बदलाव निश्चत होना तय है। कुछ युवाओं का ध्यान अपनी पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं पर रहता है, इसलिए वे राजनीति में नहीं जाना चाहते। आज भी अच्छे घरों के उच्च शिक्षित युवा राजनीति में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। कई विसंगतियां जो हमें देश की राजनीति में दिखती है; तो उन्हें दूर करने के लिए देश के युवाओं को आगे आना होगा। देश की राजनीति को सुधारने के लिए पढ़े-लिखे युवाओं को राजनीति में आना ही होगा। भारत का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। मैं अनुभव को दरकिनार नहीं करता परन्तु यदि युवा वर्ग को आगे आने का अवसर नहीं मिलेगा तो वह कैसे अनुभव प्राप्त करेगा। आप युवाओं की दस खामियां तो गिनाते हैं; परन्तु आज के तथाकथित अनुभवी राजनीतिज्ञों की कारगुजारियों पर क्यूँ चुप हो जाते हैं? हम सिर्फ यही कह कर चर्चाओं में शामिल होते रहेंगे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। परन्तु अब और नहीं सहेंगे। हम युवाओं को चर्चाओं के मंच से बाहर निकल कर वास्तविकता की कसौटी पर स्वयं को साबित करना ही होगा और अपने हक को उनसे प्राप्त करना ही होगा। देश को सामरिक दृष्टि से सुरक्षित तथा देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा प्रदान करने के सन्दर्भ में सैन्य क्षमता एवं पुलिस प्रशासन कि बात आती है तो उसमें युवाओं की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है; क्योंकि इस क्षेत्र में जितना अधिक युवाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा वह देश उतना ही अधिक सुरक्षित रहेगा। कुछ लोग राष्ट्र निर्माण मात्र और मात्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखते हैं, परन्तु राष्ट्र निर्माण मात्र राजनीति से ही नहीं होता। राष्ट्र निर्माण होता है राष्ट्रवासी से। यदि देश में निवास करने वाला प्रत्येक राष्ट्रवासी यह ठान ले कि हमें अन्याय नहीं सहना है अन्याय नहीं करना है तो राष्ट्र निर्माण की वह बुनियाद पड़ेगी कि युगों के बीतने पर भी राष्ट्र की ईमारत बुलंद रहेगी। इसके बाद देश और समाज का हित होना तय हो सकता है।हमें पता है कि कोई पैदाइशी नेता नहीं होता। (इसमें वे कुछ हजार परिवार शामिल नहीं हैं, जिनका पैतृक कारोबार राजनीति है) नेता बनने के लिए लगन से काम करना होता है।मीडिया के खिलाडी व साधक, धनबली, बाहुबली, भाषणबाज,भीड़ बाला हिट, सेक्युलर, हिंदूवादी, समाजवादी या फिर जातिवादी आज कीराजनीति है जबकि इसे सही मामले में विकासवादी होना चाहिए था। हम जनता शातिर भी है और भोली भी। आज आवश्यकता है शुचिता की, अपराधियों और अक्षम लोगों को चुनाव और राजनीति से दूर रखने की। चर्चाओं में कई सुझाव और प्रस्ताव आते हैं लेकिन चुनाव के हार जीत के बाद सरकार ही नहीं, आम जन के स्तर से भी यह बातें हवा हो चुकी होती है। भारत के ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक सहित विभिन्न आयामों के वृहद ज्ञान रखने वालों से राजनीति में आने की हिमायत हमेशा की जाती रही है। यदि पाठशाला से पढ़े युवा राजनीति में आयेंगे तो देश की दिशा और दशा बदल सकती है। साथ ही राजनीति से घृणा करने की प्रवृत्ति पर भी प्रभावी विराम लग सकेगा, ऐसा हो नहीं सकता है। इस सोच को जन्म देने वाले बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि एक झटके में सब कुछ बदल जाने वाला नहीं है लेकिन इसके प्रयास आज से ही शुरु कर दिये जाने चाहिए क्योंकि यह ‘सोच’ बहुआयामी है।राजनीति के अपराधीकरण और देश एवं समाज की मूल समस्याओं से अनभिज्ञ रहने वाले अशिक्षित अल्पशिक्षित अथवा शिक्षित लोगों के मुख्य धारा में आने से समस्यायें घट सकती हैं।इस कवायद से राजनीति में न सिर्फ अपराधियों का पदार्पण कम होगा बल्कि अशिक्षित एवं राजनीति को पेशा मानकर इस दिशा की ओर रूख करने वालों की संख्या भी शून्य हो जायेगी। राजनीति में आ चुकी गंदगी को साफ करने में भी इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद सफलता मिलेगी। देश को आजादी मिले अब बहुत समय बीत चुका है। देश-काल-परिस्थितियों के हिसाब से अब कुछ बदलाव करने का समय आ गया है।देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल से लोगों में काफी निराशा है। आजादी मिलने के बाद के शुरुआती वर्षों में पार्टियों से जो थोड़ी−बहुत आशा थी, समय के साथ वो धीरे−धीरे खत्म हो रही है। अधिकतर पार्टियां आम जनता से कट चुकी हैं। वे अब सत्ता प्राप्ति के लिए जनबल की बजाय धनबल और बाहुबल पर अधिक यकीन करती हैं। उनका प्रबंधन जनसंगठनों की तरह नहीं बल्कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह होता है। लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरने वाली ये पार्टियां कुछ गिने−चुने व्यक्तियों की मिल्कियत हो चुकी हैं। जो जनप्रतिनिधि इन पार्टियों के बैनर तले चुनकर आते हैं, वे वास्तव में जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के आकाओं के एजेंट होते हैं। उन्हें अगर जनता और पार्टी में से किसी एक को चुनना पड़ा तो वे निश्चित रूप से पार्टी को ही चुनेंगे। देश की राजनीति में पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक क्षेत्रवाद, जातिवाद और परिवारवाद का बोलबाला है। और ये प्रवृत्ति दिन ब दिन और बलवती हो रही है। लगभग सभी दल साम दाम दंड और भेद से केवल सत्ता हासिल करने में जुटे हुये हैं। असल में बाजारवाद के चलते पिछले लगभग छह दशकों में पूरी दुनिया में दलीय राजनीति जनोन्मुखी न रह कर महज सत्ताकेन्द्रित हो गयी है। राजनीतिक दल विभिन्न स्वार्थों के प्रतिनिधि या दबाव समूह मात्र रह गए हैं। इस सबके कारण दलीय राजनीति का मूल तकाजा उपेक्षित रह गया। मूल तकाजा यह था कि दल अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज में एक वैश्विक दृष्टि और जनोन्मुखी नीतियों की आधारशिला तैयार करें। जमीनी हालात यह हैं कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी देश की जनता बिजली, पानी, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, शौचालय, नाली−खडंजे जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। विकास के जो कार्य हो भी रहे हैं उनकी रफ्तार इतनी धीमी है कि लोगों का सब्र जवाब देने लगा है।वर्तमान राजनीतिक हालातों पर नजर डालें हम सब का दुर्भाग्य यह है कि कोई भी दल, कोई भी सरकार अच्छे कार्यों में एक−दूसरे के साथ स्पर्धा करने के बजाय गलत कामों में होड़ बनाए हुए है। आज हम आप यूपी या बिहार में कानून व्यवस्था के बिगड़ने की दुहाई देते हैं तो वहां के सत्तारूढ़ नेता राजस्थान या महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के हालात दिखाने लगते हैं। फलना चिलना के शासन पर उंगली उठाते हैं तो चिलना पलटकर कर्नाटक या उत्तराखंड या हिमाचल के नमूने पेश कर देती हैं। सच तो यह है कि कानून व्यवस्था से लेकर संवेदनशील प्रशासन या नेताओं, अफसरों की जवाबदेही आदि के मामले में सभी सत्तारूढ़ पार्टियां एक−दूसरे की तुलना में बहुत घटिया प्रदर्शन कर रही हैं। इसके बाद इस देश की जनता के लिए कुछ भी सुखद निकल सकेगा, इस बारे में संदेह है। वो चाहे यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान या अन्य कोई प्रदेश वहां की जनता बार−बार एक पार्टी विशेष के शासन से दुखी होकर दूसरी पार्टी को सरकार सौंपती है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। कई प्रदेशों की कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार तथा सरकारी संवेदनहीनता का विश्लेषण किया जाए तो तो राजनीतिक दलों में एक−दूसरे को हराने की होड़ में लगी दिखाई देती है। गांधी जी की लिखित सलाह के विपरीत कांग्रेस ने राजनीतिक दल के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया। स्वतंत्रता आंदोलन की साख के कारण कई दशकों तक सत्ता पर उसका एकछत्र नियंत्रण रहा। इसके बावजूद जब देश में प्रगति का उपयुक्त वातावरण नहीं बन पाया, तब लोगों ने कांग्रेस को हटाकर एक नए दल को सत्ता सौंपने का निर्णय किया।1977 में संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ जनता पार्टी का शासन आ गया। देश की जनता को इस बदलाव से बड़ी आशा थी। लेकिन शीघ्र ही सारी आशाएं धूल में मिल गईं। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह और जनता दल के रूप में देश की जनता ने एक और प्रयोग किया। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। इसके बाद भी कई फुटकर प्रयोग होते रहे। वर्ष 1998 में भारतीय जनता पार्टी को भी सरकार बनाने का मौका मिला। वर्ष 2004 तक यह पार्टी लगातार सत्ता में रही। लोगों का विश्वास था कि भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी राजनीतिक शक्ति है जो भारतीय सभ्यता के संरक्षण एवं भारतीय राष्ट्र के पुनरोत्थान के प्रति अन्य दलों की अपेक्षा कहीं अधिक समर्पित है। लोगों का विश्वास था कि जब वे ऐसी समर्पित राजनीतिक शक्तियों को सत्ता पर स्थापित करने में सफल होंगे तो उनके समस्त कार्यों में अनाधिकार हस्तक्षेप की राजकीय तंत्र की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। राज्य के विभिन्न अंग उनकी सांस्कृतिक एवं सभ्यतानिष्ठ संवेदनाओं का सम्मान करना सीखेंगे। भारतभूमि पर उपलब्ध प्रचुर प्राकृतिक संपदाओं, भारत के लोगों के कौशल एवं विभिन्न क्षेत्रों में उनकी अद्वितीय क्षमताओं का राष्ट्रोत्थान के कार्य में समुचित संयोजन करने का गंभीर प्रयास किया जाएगा। लेकिन, दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जब से भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ, तब से लेकर आजतक सभी प्रमुख दलों को सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर सभी राजनीतिक दल सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। लेकिन, कोई भी भारतीय राज्य के स्वरूप एवं उसकी दिशा में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं कर सका है। सभी लोग सत्ता में आने से पहले एक तरह की बात करते हैं, किंतु धीरे−धीरे वे भी अन्य नेताओं के रंग में ढल जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता से तो इतना ही हो सकता है, ज्यादा कुछ नहीं अंततः वे स्थितियों से समझौता कर बैठते हैं। पिछले दो−तीन दशकों में तो देश ने कई गंभीर आंतरिक मतभेदों, आर्थिक सामाजिक और धार्मिक समस्याओं के समाधान में भारतीय राजनीति और उसके शीर्ष नेताओं की शर्मनाक विफलताओं के अनेक मनहूस दौर देखे हैं। चतुर अंग्रेजों को डिगा देने वाली राजनीतिक इच्छा शक्ति अब कैसे दम तोड़ रही है उसे जनता देख रही है। अफसोस! इन दो−तीन दशकों ने देश को अधिकांश रूप से मनहूस और बोदे, जातिवाद में डूबे भ्रष्टाचार से बिजबिजाते नेता दिए हैं। इस दौर में न केवल राजनीति का दर्दनाक पतन हुआ है अपितु न्याय पालिका और नौकरशाही भी संदेह और अपवादों की चपेट में है। ऐसा लगता है कि जैसे न्यायपालिका अब कार्यपालिका का कार्य करने लगी है।नेताओं की वजह से देश में एक दारोगा से लेकर डीजी पुलिस तक अपनी नौकरी गिरवी रखकर लूटखसोट में शामिल हैं। बदमाश, गुंडे और माफियाओं के लिए नेता और पुलिस आदर्श शरणदाता के रूप में बदल गए हैं। मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के आवास देश के अराजकतत्वों के सुरक्षित नेटवर्क के रूप में तब्दील हो रहे हैं। जिन्हें पुलिस ढूंढती फिर रही है वह नेताओं के घरों में या सरकारी गेस्ट हाउसों में या प्रेस क्लबों में मौज मार रहे हैं। जिन्हें जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए वह बीमारी का बहाना बनाकर इलाज के नाम पर पंचसितारा अस्पतालों में भर्ती होकर वहीं से अपना राजनीतिक रैकेट चला रहे हैं। नेताओं की ही फौज के कारण देश में जाति−धर्म और क्षेत्र के नाम पर नंगा नाच हो रहा है।जनसंख्या जैसी महामारी पर कोई नेता बोलने को तैयार नहीं है। हर पार्टी के शासन का हाल यह है कि पीने के पानी की भारी किल्लत है। कई जगहों पर पानी बहुत मैला, जहरीला आ रहा है। बिजली की उपलब्धता के बारे में बयान कुछ और आते हैं, असलियत कुछ और है। कानून के डर व राज के बावजूद यदि देश के हर हिस्से में, हर पार्टी के शासन में मिलावट धड़ल्ले से जारी है तो इसका एक ही अर्थ है कि सरकारी अमले और सत्तारूढ़ लोगों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है। विडम्बना यह है कि पानी और बिजली, श्क्षिा, चिकित्सा सेवाओं के मामले में आम जनता का रवैय्या और सोच भी ठीक नहीं है लेकिन यह घटिया सोच भी नेताओं की ही बनाई हुई है। आर्थिक सुधारों के इस युग में जयललिता व अन्य कई नेता मुफ्त बिजली को और हासिल करने का अधिकार आज भी बनाए हुए हैं। कहने का अर्थ यह है कि देश की कोई भी पार्टी वोट पाने यानी सत्ता चलाने का हक अपनी योग्यता, अपनी सफलताओं और उपलब्धियों के बूते हासिल नहीं करना चाहती। वे बस अन्य दलों की विफलता या बदनामी के बूते पर सत्ता में आना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि जिन घटिया मुद्दों पर वे अपने विरोधी दल की सरकार को घरेते हैं वही मुद्दे तब उनके गले की फांस बन जाएंगे जब वे सत्ता में आएंगे। हर सेवा और हर वस्तु मुफ्त या सस्ती पाने का लालच देश को वहां ले आया है जहां उन्हें कुछ भी नहीं मिल रहा। जो जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वह भी नहीं। उनका जीवन सुखी तो क्या होगा, सुरक्षित तक नहीं है।
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
रहीमदास जी का लिखा यह दोहा संतों यानी अच्छे गुण वाले लोगों की खासियत बताता है. इसे समझाने के लिए उन्होंने सांप और चंदन का उदाहरण दिया है. इस दोहे के अर्थ की बात करें तो यह कह रहा है कि बुरे लोगों की संगत कभी अच्छे लोगों में खामियां पैदा नहीं कर सकती, ठीक वैसे ही जैसे चंदन के पेड़ से लिपटे सांप कभी उसे जहरीला नहीं कर पाते. इस दोहे से मिलने वाली सीख तो अपनी जगह सही है,पर अब जय हो-भय हो के झंझट को आखिरकार जनता ने समझ ही लिया है।बेशक, ऐसा भी समय आएगा जब ये ताकतें विकास का अपना एजेंडा समझेंगी और बनाएंगी और सामाजिक न्याय के तकाजों को भी पूरा करेंगी। अगर नहीं करेंगी तो लोकतंत्र फिर उनका इलाज कर देगा। अब हमें नेता नहीं प्रगति चाहिए, हो सकता है, बस आपको भी फिक्स करना है अपने सपने को सच्चाई से। जो चीजों को चलाए, चालू रखे, वैसे नेता बनना औैर बनाना हैं। चलते रहिए-चलाते रहिए, क्योंकि धूप से परेशान करोड़ों निगाहें आंखों पर हाथ टिकाए इस लोकतंत्र में एक मसीहा के आने का इंतजार कर रही हैं…कहीं वह आप तो नहीं………..

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नीतीश कुमार सियासी पलटियां
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एक साथ शुरुआत
1970 के दशक में लालू और नीतीश पहली बार साथ आए. दोनों जयप्रकाश नारायण के सोशलिस्ट आंदोलन का हिस्सा थे.
लालू के सलाहकार
1990 में बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को बहुमत मिला. लालू पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और नीतीश कुमार बने मुख्यमंत्री के सलाहकार.
समता पार्टी का गठन
साल 1994 में नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाने के लिए लालू यादव का साथ छोड़ दिया. उन्होंने जॉर्ज फर्नान्डिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई.
कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन
1995 के विधानसभा चुनावों में नीतीश ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन कर पहली बार अलग चुनाव लड़ा था.
बीजेपी से जुड़ा नाता
साल भर बाद ही नीतीश ने यू-टर्न लिया और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में शरीक हो गए. दोनों का गठबंधन हुआ. और अगले 17 सालों तक चला.
जनता दल यूनाटेड
समता पार्टी अपने सफर के दौरान साल 2003 में जनता दल यूनाटेड (जेडीयू) बन गई. लेकिन बीजेपी से गठबंधन जारी रहा. दोनों पार्टी ने 2005 से 2013 तक बिहार में गठबंधन सरकार चलाई.
नरेंद्र मोदी का विरोध
2014 में जब बीजेपी ने मोदी को पीएम का कैंडिडेट घोषित किया तो सांप्रदायिकता का सवाल उठाते हुए नीतीश ने बीजेपी से 17 साल पुराना नाता तोड़ लिया.
मांझी बने मुख्यमंत्री
मई 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक एक दिन बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. तब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद के लिए जीतनराम मांझी को चुना.
मांझी को किया बाहर
नीतीश सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते थे और इसी को लेकर जीतनराम मांझी को लेकर मनमुटाव हो गए. नीतीश और मांझी का ये विवाद बढ़ गया और इसका अंत मांझी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के साथ हुआ.
नीतीश खुद बने मुख्यमंत्री
फरवरी 2015 के आखिरी हफ्ते में नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने. बीजेपी को हराने के लिए उन्होंने लालू यादव और कांग्रेस से हाथ मिलाकर महागठबंधन बनाया.
बीजेपी से नजदीकियां
लेकिन इसी बीच उन्होंने बीजेपी को अपने घर भोज का न्यौता भेज कर सबको हैरानी में डाल दिया. इसके बाद नोटबंदी, फर्जी डिग्री, उरी अटैक, जीएसटी और राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दों पर नीतीश मोदी से सुर मिलाते नजर आए
एक बार फिर यू टर्न
अब नीतीश कुमार ने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप के मुद्दे को लेकर इस्तीफा दे दिया. इसके तुरंत बाद बीजेपी से समर्थन लेकर नीतीश कुमार छठी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. महज 18 घंटे के अंदर नये गठबंधन में मुख्यमंत्री बनने का ये शायद पहला मामला है.

राजा हमेशा रानी के पेट से पैदा नहीं होता- वे 20 साल शासन करेंगे।लालू,

चेहरा नहीं सोंच बदलो।
उमाशंकर सिंह
भारत भाग्य विधाता कौन, आम आदमी, यह तो सदी का सबसे बड़ा जोक होगा। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि “किसी भी समाज को बर्बाद करने में सबसे बड़ा योगदान उस समाज के पढ़े लिखे, यूवा और बुद्धिजीवी वर्ग का होता है जो यह कहता है कि मुझे राजनीति से नफरत है। ऐसा कहकर वह अपने ऊपर अपने से कम काबिल लोगों को राज करने का अवसर दे देता है”। यह शब्द कहने को विरोधाभाषी जरूर है पर मेरी नजर में बिल्कुल सत्य भी। देखिए ना आज हमारे देश में प्रजातंत्र शब्द का मतलब विरोधाभाषी होता जा रहा है। चुनाव और पद मिलने के बाद नेता जीआगे बढ़ रहे हैं और जनता पीछे छूट रही है। पहले के नेता समाज में मूल्यों के लिए जीते थे और अब इसके मायने बदल रहे हैं। ऐसा सालों से चल रहा है। सत्ता हासिल करने के बाद जनता की भावनाएं नेताओं के लिए कोई महत्व नहीं रखती है। इसके चलते समाज भी पिछड़ती जा रही है। एक अच्छे नेता के लिए जरूरी है कि वह न केवल चरित्रवान हो बल्कि वह संघर्षशील, निडर, विपरीत परिस्थिति में लोगों को अपनी तरफ मोड़ने की शक्ति रखने वाला हो।एक अच्छे नेता का गुण है कि वह सबकी बात को अच्छी तरह सुने और संवाद बनाए रखे। उत्तेजित करने या अपमान करने वाली बातों से विचलित न हों बल्कि सहनशक्ति विकसित करें। आज पार्टियां और सरकारें बदलती हैं तो सिर्फ नुक्कड़ और चैराहों पर लगे इश्तिहार ही नहीं बदलते बल्कि सारे के सारे शहर का पोशाक बदल जाता है.आज आपके पास राजनीति में न होने का कोई विकल्प नहीं है, आपके पास केवल दो ही विकल्प हैं या तो आप राजनीति का हिस्सा हैं या आप राजनीति के शिकार हैं। परन्तु समस्या यह है कि ज्यादातर लोग राजनीति का हिस्सा न होने के कारण राजनीति के शिकार बने हुए हैं। आजअलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के सत्ता बदलने से चेहरा जरूर बदलीलेकिन रंग नहीं बदले. आज जो सरकार सत्ता में आती है वह अपनी विचारधारा या पार्टी के रंग में सरकारी संपत्ति को रंग देती है.आज हमारे राजनेता हमारी राजनीति और हमारे समाज को दर्शाते हैं. राजनीति सामाजिक और सांस्कृतिक विधाओं और विभिन्नताओं का स्पेस कम और पैसा कमाई का जरिया ज्यादा बन गया है.पहले शहर में राजनीति होती थी. अब शहरों की राजनीति होती है.क्या यह चिंता की बात नहीं है कि इतने बड़े देश में कोई राजनीतिक विकल्प न हो जो जरूरत पड़ने पर वर्तमान सत्तारूढ़ दल का स्थान ग्रहण कर सके? एक दल सफल होती है तो और नहीं सफल होती है तो भी; अच्छा लोकतंत्र वही होता है जिसमें वर्तमान का विकल्प हमेशा मौजूद रहे। अपना देश विकल्पों पर नहीं, सामने मौजूद चुनौतियों पर फैसला लेना जानता है।नेताओं में बाहुवली और जातिवादी दोनों राजनीति के लिए खतरनाक है यह कहना जरूरी है। ये दोनों ही लोगों को बाँटने की कोशिश करते रहे हैं और सत्ता की लालसा में किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसों को लगता है कि जमाना उनके हिसाब से चलता है। उन्हें इसका आभास नहीं कि बाहर बैठा चायवाला ज्यादा राजनैतिक बहस करता है। उसे समाज, राजनीति और अर्थ की समझ वास्तविकता से आती है, करोडों की कमाई कर सारी सुख सुविधाओं में रहकर ये लोकतंत्र की परिभाषा को आम आदमी को समझाते हंै, तो ये हजम नहीं होता।समाज आज राजनीति को अछूत जैसी नजर से देखती है। आज अपने घर में बच्चों को लोग पढ़ाते हैं और उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने की बात करते हैं। कोई भी अभिभावक या परिवार अपने बच्चे को यह नहीं कहता की मेहनत से पढ़ो तुम्हें राजनीति करना है। समाज को यह धारणा बदलनी होगी। भारत आज युवा शक्ति के मामले में दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध है। यह स्थिति भारत को विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण दिशा दे सकती है। यह सपना तभी पूरा होगा, जब देश, समाज युवाओं को प्राथमिकता देंगे। युवाओं को मौका देंगे और युवा विकास एजेंडा तय करने के लिए अपने आपको देश और राजनीति को समर्पित करेंगे।आज आपके पासपैसा हो सकता है, मगर उसे चलाने वाले कौन, उद्योगपति, मगर उनके भी हित कहीं और से सधते हैं। सही समझ रहे हैं। आप लकदक खादी में सजे, चेहरे पर लालिमा और माथे पर तमाम परेशानियों की वजह से कुछ सिलवटें लिए नेता ही तय करते हैं समय की रफ्तार। मगर नेता बनना इतना आसान तो नहीं। अगर आज कोई आम आदमी आपसे कहे कि मैं राजनीति में कैरियर बना रहा हूं तो आप उसे पागल या सनकी ही कहेंगे। सवाल है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, टीचिंग, मार्केटिंग आदि क्षेत्रों में कैरियर बनाया जा सकता है तो राजनीति में क्यों नहीं? यह सच है कि राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, लेकिन यह भी पूरी तरह सही नहीं है कि अगर इरादे सच्चे हों तो बाकी ज्यादातर क्षेत्रों में सिर्फ आप अपने लिए काम करते हैं जबकि राजनीति में कैरियर बनाकर आप देश की बेहतरी में योगदान दे सकते हैं और देशवासियों की सेवा कर सकते हैं। राजनीति में आने के बाद बेहद जरूरी कामों में है चुनाव लड़ना।मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की एक पंक्ति है
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…

राजनीति से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अच्छे लोगों का आना जरूरी है। यह बहुत सुंदर देश है। अच्छे लोग आएंगे, तभी हमारी भारत मां और सुंदर हो सकेगी। हमें लगता है कि राजनीति हमारेे बस का काम नहीं है, मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता, शायद मैं राजनीति में सफल नहीं हो पाऊँगा या यदि मैं राजनीति में गया तो मेरे काम धंधे का क्या होगा, क्या मुझे काम बंद करना पड़ेगा, ये तथा इसी प्रकार की बहुत सी बातें अकसर हमें राजनीति में आने से रोकती है। परन्तु जरा सोचिए; यदि अच्छे लोग इसी तरह राजनीति से दूर रहेंगे तो राजनीति में बुरे लोग ही आते रहेंगे तथा वे बुरे लोग अच्छे लोगों का शोषण ही करते रहेंगे जो आज हो रहा है।आज हम युवाओं को इसके प्रति ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है। हर छोटी और बड़ी घटनाओं पर मंथन करें तो सामने आता है कि ऐसा हम जिम्मेदारों का समाज से कट जाने के कारण होता है। यह भी हैरानी की बात है कि शिक्षा व्यवस्था में प्रजातंत्र जैसी बातों को काफी कम महत्व दिया जाता है। इसके कारण लोगों में इसके प्रति ज्ञान का अभाव भी समाज को कमजोर बना रहा है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि वे युवा जो नई सोच रखते हैं, समाज को आगे लेकर जाने की इच्छाशक्ति रखते हैं और ईमानदारी से वह सबकुछ करने का जिससे समाज में बदलाव आए; उन्हें आगे आना चाहिए। युवा ही इसकी दिशा बदल सकते हैं। अच्छी पढ़ाई और ज्ञानवान यूथ को इसके प्रति सोचना होगा। सत्ता का मोह छोड़कर जनता और समाज के हितों के बारे में सोचना होगा। इसके बाद समाज में बदलाव निश्चत होना तय है। कुछ युवाओं का ध्यान अपनी पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं पर रहता है, इसलिए वे राजनीति में नहीं जाना चाहते। आज भी अच्छे घरों के उच्च शिक्षित युवा राजनीति में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। कई विसंगतियां जो हमें देश की राजनीति में दिखती है; तो उन्हें दूर करने के लिए देश के युवाओं को आगे आना होगा। देश की राजनीति को सुधारने के लिए पढ़े-लिखे युवाओं को राजनीति में आना ही होगा। भारत का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। मैं अनुभव को दरकिनार नहीं करता परन्तु यदि युवा वर्ग को आगे आने का अवसर नहीं मिलेगा तो वह कैसे अनुभव प्राप्त करेगा। आप युवाओं की दस खामियां तो गिनाते हैं; परन्तु आज के तथाकथित अनुभवी राजनीतिज्ञों की कारगुजारियों पर क्यूँ चुप हो जाते हैं? हम सिर्फ यही कह कर चर्चाओं में शामिल होते रहेंगे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। परन्तु अब और नहीं सहेंगे। हम युवाओं को चर्चाओं के मंच से बाहर निकल कर वास्तविकता की कसौटी पर स्वयं को साबित करना ही होगा और अपने हक को उनसे प्राप्त करना ही होगा। देश को सामरिक दृष्टि से सुरक्षित तथा देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा प्रदान करने के सन्दर्भ में सैन्य क्षमता एवं पुलिस प्रशासन कि बात आती है तो उसमें युवाओं की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है; क्योंकि इस क्षेत्र में जितना अधिक युवाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा वह देश उतना ही अधिक सुरक्षित रहेगा। कुछ लोग राष्ट्र निर्माण मात्र और मात्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखते हैं, परन्तु राष्ट्र निर्माण मात्र राजनीति से ही नहीं होता। राष्ट्र निर्माण होता है राष्ट्रवासी से। यदि देश में निवास करने वाला प्रत्येक राष्ट्रवासी यह ठान ले कि हमें अन्याय नहीं सहना है अन्याय नहीं करना है तो राष्ट्र निर्माण की वह बुनियाद पड़ेगी कि युगों के बीतने पर भी राष्ट्र की ईमारत बुलंद रहेगी। इसके बाद देश और समाज का हित होना तय हो सकता है।हमें पता है कि कोई पैदाइशी नेता नहीं होता। (इसमें वे कुछ हजार परिवार शामिल नहीं हैं, जिनका पैतृक कारोबार राजनीति है) नेता बनने के लिए लगन से काम करना होता है।मीडिया के खिलाडी व साधक, धनबली, बाहुबली, भाषणबाज,भीड़ बाला हिट, सेक्युलर, हिंदूवादी, समाजवादी या फिर जातिवादी आज कीराजनीति है जबकि इसे सही मामले में विकासवादी होना चाहिए था। हम जनता शातिर भी है और भोली भी। आज आवश्यकता है शुचिता की, अपराधियों और अक्षम लोगों को चुनाव और राजनीति से दूर रखने की। चर्चाओं में कई सुझाव और प्रस्ताव आते हैं लेकिन चुनाव के हार जीत के बाद सरकार ही नहीं, आम जन के स्तर से भी यह बातें हवा हो चुकी होती है। भारत के ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक सहित विभिन्न आयामों के वृहद ज्ञान रखने वालों से राजनीति में आने की हिमायत हमेशा की जाती रही है। यदि पाठशाला से पढ़े युवा राजनीति में आयेंगे तो देश की दिशा और दशा बदल सकती है। साथ ही राजनीति से घृणा करने की प्रवृत्ति पर भी प्रभावी विराम लग सकेगा, ऐसा हो नहीं सकता है। इस सोच को जन्म देने वाले बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि एक झटके में सब कुछ बदल जाने वाला नहीं है लेकिन इसके प्रयास आज से ही शुरु कर दिये जाने चाहिए क्योंकि यह ‘सोच’ बहुआयामी है।राजनीति के अपराधीकरण और देश एवं समाज की मूल समस्याओं से अनभिज्ञ रहने वाले अशिक्षित अल्पशिक्षित अथवा शिक्षित लोगों के मुख्य धारा में आने से समस्यायें घट सकती हैं।इस कवायद से राजनीति में न सिर्फ अपराधियों का पदार्पण कम होगा बल्कि अशिक्षित एवं राजनीति को पेशा मानकर इस दिशा की ओर रूख करने वालों की संख्या भी शून्य हो जायेगी। राजनीति में आ चुकी गंदगी को साफ करने में भी इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद सफलता मिलेगी। देश को आजादी मिले अब बहुत समय बीत चुका है। देश-काल-परिस्थितियों के हिसाब से अब कुछ बदलाव करने का समय आ गया है।देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल से लोगों में काफी निराशा है। आजादी मिलने के बाद के शुरुआती वर्षों में पार्टियों से जो थोड़ी−बहुत आशा थी, समय के साथ वो धीरे−धीरे खत्म हो रही है। अधिकतर पार्टियां आम जनता से कट चुकी हैं। वे अब सत्ता प्राप्ति के लिए जनबल की बजाय धनबल और बाहुबल पर अधिक यकीन करती हैं। उनका प्रबंधन जनसंगठनों की तरह नहीं बल्कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह होता है। लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरने वाली ये पार्टियां कुछ गिने−चुने व्यक्तियों की मिल्कियत हो चुकी हैं। जो जनप्रतिनिधि इन पार्टियों के बैनर तले चुनकर आते हैं, वे वास्तव में जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के आकाओं के एजेंट होते हैं। उन्हें अगर जनता और पार्टी में से किसी एक को चुनना पड़ा तो वे निश्चित रूप से पार्टी को ही चुनेंगे। देश की राजनीति में पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक क्षेत्रवाद, जातिवाद और परिवारवाद का बोलबाला है। और ये प्रवृत्ति दिन ब दिन और बलवती हो रही है। लगभग सभी दल साम दाम दंड और भेद से केवल सत्ता हासिल करने में जुटे हुये हैं। असल में बाजारवाद के चलते पिछले लगभग छह दशकों में पूरी दुनिया में दलीय राजनीति जनोन्मुखी न रह कर महज सत्ताकेन्द्रित हो गयी है। राजनीतिक दल विभिन्न स्वार्थों के प्रतिनिधि या दबाव समूह मात्र रह गए हैं। इस सबके कारण दलीय राजनीति का मूल तकाजा उपेक्षित रह गया। मूल तकाजा यह था कि दल अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज में एक वैश्विक दृष्टि और जनोन्मुखी नीतियों की आधारशिला तैयार करें। जमीनी हालात यह हैं कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी देश की जनता बिजली, पानी, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, शौचालय, नाली−खडंजे जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। विकास के जो कार्य हो भी रहे हैं उनकी रफ्तार इतनी धीमी है कि लोगों का सब्र जवाब देने लगा है।वर्तमान राजनीतिक हालातों पर नजर डालें हम सब का दुर्भाग्य यह है कि कोई भी दल, कोई भी सरकार अच्छे कार्यों में एक−दूसरे के साथ स्पर्धा करने के बजाय गलत कामों में होड़ बनाए हुए है। आज हम आप यूपी या बिहार में कानून व्यवस्था के बिगड़ने की दुहाई देते हैं तो वहां के सत्तारूढ़ नेता राजस्थान या महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के हालात दिखाने लगते हैं। फलना चिलना के शासन पर उंगली उठाते हैं तो चिलना पलटकर कर्नाटक या उत्तराखंड या हिमाचल के नमूने पेश कर देती हैं। सच तो यह है कि कानून व्यवस्था से लेकर संवेदनशील प्रशासन या नेताओं, अफसरों की जवाबदेही आदि के मामले में सभी सत्तारूढ़ पार्टियां एक−दूसरे की तुलना में बहुत घटिया प्रदर्शन कर रही हैं। इसके बाद इस देश की जनता के लिए कुछ भी सुखद निकल सकेगा, इस बारे में संदेह है। वो चाहे यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान या अन्य कोई प्रदेश वहां की जनता बार−बार एक पार्टी विशेष के शासन से दुखी होकर दूसरी पार्टी को सरकार सौंपती है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। कई प्रदेशों की कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार तथा सरकारी संवेदनहीनता का विश्लेषण किया जाए तो तो राजनीतिक दलों में एक−दूसरे को हराने की होड़ में लगी दिखाई देती है। गांधी जी की लिखित सलाह के विपरीत कांग्रेस ने राजनीतिक दल के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया। स्वतंत्रता आंदोलन की साख के कारण कई दशकों तक सत्ता पर उसका एकछत्र नियंत्रण रहा। इसके बावजूद जब देश में प्रगति का उपयुक्त वातावरण नहीं बन पाया, तब लोगों ने कांग्रेस को हटाकर एक नए दल को सत्ता सौंपने का निर्णय किया।1977 में संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ जनता पार्टी का शासन आ गया। देश की जनता को इस बदलाव से बड़ी आशा थी। लेकिन शीघ्र ही सारी आशाएं धूल में मिल गईं। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह और जनता दल के रूप में देश की जनता ने एक और प्रयोग किया। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। इसके बाद भी कई फुटकर प्रयोग होते रहे। वर्ष 1998 में भारतीय जनता पार्टी को भी सरकार बनाने का मौका मिला। वर्ष 2004 तक यह पार्टी लगातार सत्ता में रही। लोगों का विश्वास था कि भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी राजनीतिक शक्ति है जो भारतीय सभ्यता के संरक्षण एवं भारतीय राष्ट्र के पुनरोत्थान के प्रति अन्य दलों की अपेक्षा कहीं अधिक समर्पित है। लोगों का विश्वास था कि जब वे ऐसी समर्पित राजनीतिक शक्तियों को सत्ता पर स्थापित करने में सफल होंगे तो उनके समस्त कार्यों में अनाधिकार हस्तक्षेप की राजकीय तंत्र की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। राज्य के विभिन्न अंग उनकी सांस्कृतिक एवं सभ्यतानिष्ठ संवेदनाओं का सम्मान करना सीखेंगे। भारतभूमि पर उपलब्ध प्रचुर प्राकृतिक संपदाओं, भारत के लोगों के कौशल एवं विभिन्न क्षेत्रों में उनकी अद्वितीय क्षमताओं का राष्ट्रोत्थान के कार्य में समुचित संयोजन करने का गंभीर प्रयास किया जाएगा। लेकिन, दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जब से भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ, तब से लेकर आजतक सभी प्रमुख दलों को सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर सभी राजनीतिक दल सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। लेकिन, कोई भी भारतीय राज्य के स्वरूप एवं उसकी दिशा में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं कर सका है। सभी लोग सत्ता में आने से पहले एक तरह की बात करते हैं, किंतु धीरे−धीरे वे भी अन्य नेताओं के रंग में ढल जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता से तो इतना ही हो सकता है, ज्यादा कुछ नहीं अंततः वे स्थितियों से समझौता कर बैठते हैं। पिछले दो−तीन दशकों में तो देश ने कई गंभीर आंतरिक मतभेदों, आर्थिक सामाजिक और धार्मिक समस्याओं के समाधान में भारतीय राजनीति और उसके शीर्ष नेताओं की शर्मनाक विफलताओं के अनेक मनहूस दौर देखे हैं। चतुर अंग्रेजों को डिगा देने वाली राजनीतिक इच्छा शक्ति अब कैसे दम तोड़ रही है उसे जनता देख रही है। अफसोस! इन दो−तीन दशकों ने देश को अधिकांश रूप से मनहूस और बोदे, जातिवाद में डूबे भ्रष्टाचार से बिजबिजाते नेता दिए हैं। इस दौर में न केवल राजनीति का दर्दनाक पतन हुआ है अपितु न्याय पालिका और नौकरशाही भी संदेह और अपवादों की चपेट में है। ऐसा लगता है कि जैसे न्यायपालिका अब कार्यपालिका का कार्य करने लगी है।नेताओं की वजह से देश में एक दारोगा से लेकर डीजी पुलिस तक अपनी नौकरी गिरवी रखकर लूटखसोट में शामिल हैं। बदमाश, गुंडे और माफियाओं के लिए नेता और पुलिस आदर्श शरणदाता के रूप में बदल गए हैं। मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के आवास देश के अराजकतत्वों के सुरक्षित नेटवर्क के रूप में तब्दील हो रहे हैं। जिन्हें पुलिस ढूंढती फिर रही है वह नेताओं के घरों में या सरकारी गेस्ट हाउसों में या प्रेस क्लबों में मौज मार रहे हैं। जिन्हें जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए वह बीमारी का बहाना बनाकर इलाज के नाम पर पंचसितारा अस्पतालों में भर्ती होकर वहीं से अपना राजनीतिक रैकेट चला रहे हैं। नेताओं की ही फौज के कारण देश में जाति−धर्म और क्षेत्र के नाम पर नंगा नाच हो रहा है।जनसंख्या जैसी महामारी पर कोई नेता बोलने को तैयार नहीं है। हर पार्टी के शासन का हाल यह है कि पीने के पानी की भारी किल्लत है। कई जगहों पर पानी बहुत मैला, जहरीला आ रहा है। बिजली की उपलब्धता के बारे में बयान कुछ और आते हैं, असलियत कुछ और है। कानून के डर व राज के बावजूद यदि देश के हर हिस्से में, हर पार्टी के शासन में मिलावट धड़ल्ले से जारी है तो इसका एक ही अर्थ है कि सरकारी अमले और सत्तारूढ़ लोगों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है। विडम्बना यह है कि पानी और बिजली, श्क्षिा, चिकित्सा सेवाओं के मामले में आम जनता का रवैय्या और सोच भी ठीक नहीं है लेकिन यह घटिया सोच भी नेताओं की ही बनाई हुई है। आर्थिक सुधारों के इस युग में जयललिता व अन्य कई नेता मुफ्त बिजली को और हासिल करने का अधिकार आज भी बनाए हुए हैं। कहने का अर्थ यह है कि देश की कोई भी पार्टी वोट पाने यानी सत्ता चलाने का हक अपनी योग्यता, अपनी सफलताओं और उपलब्धियों के बूते हासिल नहीं करना चाहती। वे बस अन्य दलों की विफलता या बदनामी के बूते पर सत्ता में आना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि जिन घटिया मुद्दों पर वे अपने विरोधी दल की सरकार को घरेते हैं वही मुद्दे तब उनके गले की फांस बन जाएंगे जब वे सत्ता में आएंगे। हर सेवा और हर वस्तु मुफ्त या सस्ती पाने का लालच देश को वहां ले आया है जहां उन्हें कुछ भी नहीं मिल रहा। जो जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वह भी नहीं। उनका जीवन सुखी तो क्या होगा, सुरक्षित तक नहीं है।
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
रहीमदास जी का लिखा यह दोहा संतों यानी अच्छे गुण वाले लोगों की खासियत बताता है. इसे समझाने के लिए उन्होंने सांप और चंदन का उदाहरण दिया है. इस दोहे के अर्थ की बात करें तो यह कह रहा है कि बुरे लोगों की संगत कभी अच्छे लोगों में खामियां पैदा नहीं कर सकती, ठीक वैसे ही जैसे चंदन के पेड़ से लिपटे सांप कभी उसे जहरीला नहीं कर पाते. इस दोहे से मिलने वाली सीख तो अपनी जगह सही है,पर अब जय हो-भय हो के झंझट को आखिरकार जनता ने समझ ही लिया है।बेशक, ऐसा भी समय आएगा जब ये ताकतें विकास का अपना एजेंडा समझेंगी और बनाएंगी और सामाजिक न्याय के तकाजों को भी पूरा करेंगी। अगर नहीं करेंगी तो लोकतंत्र फिर उनका इलाज कर देगा। अब हमें नेता नहीं प्रगति चाहिए, हो सकता है, बस आपको भी फिक्स करना है अपने सपने को सच्चाई से। जो चीजों को चलाए, चालू रखे, वैसे नेता बनना औैर बनाना हैं। चलते रहिए-चलाते रहिए, क्योंकि धूप से परेशान करोड़ों निगाहें आंखों पर हाथ टिकाए इस लोकतंत्र में एक मसीहा के आने का इंतजार कर रही हैं…कहीं वह आप तो नहीं………..

ठवग1

नीतीश कुमार सियासी पलटियां
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एक साथ शुरुआत
1970 के दशक में लालू और नीतीश पहली बार साथ आए. दोनों जयप्रकाश नारायण के सोशलिस्ट आंदोलन का हिस्सा थे.
लालू के सलाहकार
1990 में बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को बहुमत मिला. लालू पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने और नीतीश कुमार बने मुख्यमंत्री के सलाहकार.
समता पार्टी का गठन
साल 1994 में नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाने के लिए लालू यादव का साथ छोड़ दिया. उन्होंने जॉर्ज फर्नान्डिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई.
कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन
1995 के विधानसभा चुनावों में नीतीश ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन कर पहली बार अलग चुनाव लड़ा था.
बीजेपी से जुड़ा नाता
साल भर बाद ही नीतीश ने यू-टर्न लिया और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में शरीक हो गए. दोनों का गठबंधन हुआ. और अगले 17 सालों तक चला.
जनता दल यूनाटेड
समता पार्टी अपने सफर के दौरान साल 2003 में जनता दल यूनाटेड (जेडीयू) बन गई. लेकिन बीजेपी से गठबंधन जारी रहा. दोनों पार्टी ने 2005 से 2013 तक बिहार में गठबंधन सरकार चलाई.
नरेंद्र मोदी का विरोध
2014 में जब बीजेपी ने मोदी को पीएम का कैंडिडेट घोषित किया तो सांप्रदायिकता का सवाल उठाते हुए नीतीश ने बीजेपी से 17 साल पुराना नाता तोड़ लिया.
मांझी बने मुख्यमंत्री
मई 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक एक दिन बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. तब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद के लिए जीतनराम मांझी को चुना.
मांझी को किया बाहर
नीतीश सत्ता अपने हाथ में रखना चाहते थे और इसी को लेकर जीतनराम मांझी को लेकर मनमुटाव हो गए. नीतीश और मांझी का ये विवाद बढ़ गया और इसका अंत मांझी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के साथ हुआ.
नीतीश खुद बने मुख्यमंत्री
फरवरी 2015 के आखिरी हफ्ते में नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने. बीजेपी को हराने के लिए उन्होंने लालू यादव और कांग्रेस से हाथ मिलाकर महागठबंधन बनाया.
बीजेपी से नजदीकियां
लेकिन इसी बीच उन्होंने बीजेपी को अपने घर भोज का न्यौता भेज कर सबको हैरानी में डाल दिया. इसके बाद नोटबंदी, फर्जी डिग्री, उरी अटैक, जीएसटी और राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दों पर नीतीश मोदी से सुर मिलाते नजर आए
एक बार फिर यू टर्न
अब नीतीश कुमार ने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप के मुद्दे को लेकर इस्तीफा दे दिया. इसके तुरंत बाद बीजेपी से समर्थन लेकर नीतीश कुमार छठी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. महज 18 घंटे के अंदर नये गठबंधन में मुख्यमंत्री बनने का ये शायद पहला मामला है.

राजा हमेशा रानी के पेट से पैदा नहीं होता- वे 20 साल शासन करेंगे।लालू,

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