Editorial

आजादी  v/s  आजादी

Editor Sir (2) 

हम आजाद हैंघ् इसकी अनुगूँज मुझे सीएए सपोर्ट और सीएए विरोध के करवाहट में दिखा और इसका विभत्स रूप मुझे तत्काल उत्तर पूर्वी दिल्ली के दंगों में दिखा है। इसमें मुझे इंटरनेट की दुनिया से लेकर एक सुविधाभोगी भौतिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नवनिर्मित्त उपद्रवियों की भरमार दिखा। जिसमें आज की जिंदगी के यथार्थ को एक नये ढ़ंग से रचा गया, फिर भी हम भारत वाले है कि इसके मायाजाल से निकल ही नहीं पा रहे हैं। आजादी, आपकी और मेरी तभी तक, जब तक एक दुसरे कि सीमा में नहीं आते। समय बदल चुका है। सत्ता बदल चुकी है। आज 2014/2019 वाली नई सरकार है जो अटल या मनमोहन ब्रांड नहीं, मोदी ब्रांड है, यह ‘कंट्री फर्ट’ कहने वाली और घोषित रूप से राष्ट्रवादी ब्रांड की सरकार है। यह आजादी वाली सरकार है। याद रहे आजादी के आगे एक शब्द हमेशा लिखा रहता है खबरदार! हम अक्सर आजादी को तो साफ-साफ पढ़ लेते हैं लेकिन आगे लिखे हुए ‘खबरदार’ शब्द को या तो पढ़ते ही नहीं या पढ़कर भूल जाते हैं। आज चरम आजादी, परम आजादी, अनंत आजादी मिथ ही है। याद रहे हर आजादी अपने साथ एक बंधन लेकर आती है। हम आजादी का उपयोग करते रहते हैं, बंधनों को भूल जाते हैं। पर आज की सत्ता साम्राज्यवाद का नया रूप है। राष्ट्र तलवार के साथ साथ आर्थिक नीतियों द्वारा समर्र्पीत है, याद रहे आजादी कभी अकेली नहीं आती। उसके ठीक पीछे छाया की तरह ‘गुलामी’ लगी आती है। हर आजादी की एक हद है और उसके आगे ‘खबरदार’ भी लिखा रहता है। इसको हमें नहीं भूलना चाहिए। आजादी जब भी आती है, अपने साथ कहे-अनकहे बंधन और जिम्मेदारियां लिए आती है। बिहारी खबर स्वतंत्रता के मूल्यों को बनाये रखने के लिए कृत संकल्पित हैं। अपना संविधान देश के सभी नागरिकों को बिना किसी किस्म के भेदभाव के आजादी देता है। लेकिन ज्यों ही हमारी आजादी किसी दूसरे की आजादी का हनन करती है, आजादी ‘लिमिटेड’ होने लगती है। दरअसल जिस तरह आजादी को आज परिभाषित किया जा रहा है, ऐसा लगता है जैसे किसी विचार को प्रसारित करने के लिए किया जा रहा है। कुल बहत्तर बरस पहले ही तो हमें ‘एक इंडिया’, ‘एक भारत’, ‘एक हिंदुस्तान’ मिला। ‘आपातकाल’ लगा तो फिर लोग ‘आजादी’ के लिए लड़े। आज हमारे पास एक भरी पूरी संसद है, सरकार है, विपक्ष भी है। आजाद मीडिया है, परम आजाद सोशल मीडिया है, आप विरोध के लिए आजाद हैं, आप शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर सकते हैं, हड़ताल कर सकते है। अदालतें, कानून, वकील, मुवक्किल आजाद हैं, यानी आजादी ही आजादी है। क्या हम उस आजादी का मतलब समझते हैं? आजाद भारत के नागरिक तो हैं, लेकिन एक आदर्श नागरिक का जो कर्तव्य और आचरण होना चाहिए, क्या वह हमारे अंदर है? एक आजाद देश में हमें जो अधिकार मिले हैं, हम उसका सदुपयोग कर रहे हैं? अगर कर रहे होते, तो क्या आज आजादी के 72 सालों बाद हमारे देश की यह हालत होती? आखिर हमें आजादी क्या इसीलिए मिली है कि मौका मिलते ही हम नियम-कानून को अपने हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी करें? अपनी सुख-सुविधाओं की खातिर दूसरों के अधिकारों का हनन करें? मौका मिलते ही जाति और धर्म के नाम पर एक-दूसरे के खून के प्यासे होकर दंगे करें? क्या हमारे लिए यही है आजादी का मतलब? अगर हमारे लिए आजादी के यही मायने हैं, तो माफ करिए, इससे अच्छा तो हम आजाद ही न हुए होते। आइए हम जरा अपनी गिरेबां में झांकें और तय करें कि हमारे लिए आजादी का मतलब क्या है। आजादी का मतलब यह नहीं है कि हमारे लिए संविधान में जो अधिकार मिले हैं, उसका हम दुरुपयोग करें। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने हम अच्छे नागरिक के तौर पर या सभ्य नागरिक के रूप में रहें, इसलिए कानून बनाया है। लेकिन, आज कानून को अपने हाथ में लेकर अपनी मनमर्जी करना लोगों की फिदरत बन गई है। कानून को तोड़ना लोग अपनी शान समझते हैं। हम जब चाहेंगे, तब शहर में बंद का एलान कर देंगे। आम पब्लिक की जिंदगी को बंधक बना देंगे। क्योंकि, हम आजाद देश में रहते हैं। आजादी व्यवस्था के बिना मुमकिन नहीं। दोनों एक साथ ही चलते हैं। अगर आप एक व्यवस्था नहीं बना सकते तो आजादी भी हासिल नहीं कर सकते। ये दोनों अलग-अलग नहीं किए जा सकते। हम आज भी गुलाम हैं अपने निज स्वार्थों के जो देशहित से पहले आते हैं। अगर हमें वाकई में आजादी चाहिए तो सबसे पहले अपनी उस सोच अपने अहम से हमें आजाद होना होगा, जो हमें अपनी पहचान केवल भारतीय होने से रोक देती है। हमें आजाद होना पड़ेगा उन स्वार्थों से जो देशहित में रुकावट बनती हैं। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आजादी को भौगोलिक अथवा राजनीतिक दृष्टि तक सीमित न रखें। हमें यह हमेशा याद रखना होगा कि आजादी, आजाद चिंतन विचारधारा का ऐसा लोक-प्रवाह है, जो देश, समाज को निरंतर तेजस्वी और तपस्वी लोकजीवन की ताजगी का अहसास कराती रहती है। आजादी सबको आगे बढ़ने, फलने-फूलने का मौका देती है। आजादी हम सबकी प्राकृतिक ताकत है, जो हमें अपनी ऊर्जा के बल पर खुद को जीने का अवसर देती है और दूसरे के जीवन जीने के अवसरों को छीने बिना ही उन्हें भी गरिमामय रूप से जीवन जीने का प्राकृतिक अवसर प्रदान करती है।
अश्वनीकुमार सिंह

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