editorial

                   प्यास बुझे तो आहा !

 

Editor Sir (2) 

आजकल डिजिटल का जमाना है। शहरों से लेकर गांवों तक स्मार्टफोन की उपलब्धता आसान होने से मीडिया और इंटरनेट यूज करने वाले लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। हर तरह का कंटेंट इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हो जा रहा है। ऐसे में इन

दिनों फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में भी लगातार इजाफा होती जा रही है। मीडिया और इंटरनेट जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स की बढ़ती संख्या को देखते हुए ना सिर्फ कंपनियां वरन राजनीतिक पार्टियां भी अब इस मौके को भुना रही है।

लेकिन आज की मीडिया और इंटरनेट की सबसे बडी बिडंवना कंटेंट की सत्यता को परखने के किसी मापदंड का ना होना ही है। यानि यही आज की मीडिया और इंटरनेट का सबसे बड़ा दोष है।

ढेरों गुणों से लवलेस होने के बावजू़द,

सिर्फ एक दोष सब कुछ नष्ट कर सकता है।

नाम बड़ा किस काम का जो ना आये किसी के काम।

सागर से नदियाँ ही भली जो सबकी प्यास बुझाये।।

ज्ञात रहे स्वतंत्र भारत वर्ष के सभी प्रधानमंत्रियों की अपनी विशिष्ट शैली, योगदानों से भारतीय समाज अभिभूत रहा है। पंडित नेहरू जी अपनी ऐतिहासिक सफलताओं के साथ  “भारत की खोज“ प्रधानमंत्री के रूप में सदैव याद किए जाते रहेंगे तो इंदिरा गांधी जी अपनी दो फाड़ पाकिस्तान नीति की  ऐतिहासिक सफलता, शास्त्री जी की हरित क्रांति से अभिभूत भारतीय किसान, राजीव गांधी जी का सुपर कंप्यूटर, बी.पी सिंह जी का मंडल कमीशन, चंद्रशेखर जी का विदेशों में सोना गिरवी रखने का साहसिक निर्णय, नरसिम्हाराव जी का आर्थिक उदारीकरण, बाजपेयी जी की स्वर्ण चतुर्भुज सड़क योजना के साथ ही उनके बेमिसाल भाषणों का लोकतांत्रिक भारत के निर्माण में अतुल्य योगदान, देवगौड़ाजी की लाल किले की प्राचीर से हिंदी के प्रति समर्पण तो मनमोहन सिंह जी की विशिष्ट आज्ञाकारी शैली जिसका भारत वर्ष सदैव कायल रहेगा। इमरजेंसी के खिलाफ लहर पर सवार प्रधानमंत्री भाई मोरारजी देसाईकी असफलता गैर के साथ ही कांग्रेसी सरकारों की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़ा करते वंशवादी कांग्रेस की पुनर्स्थापना इस तथ्य को उजागर करती है कि भारतीय राजनेताओं की राष्ट्र सर्वोपरि की अवधारणा महज लच्छेदार भाषणों तक ही सीमित नहीं है। विगत 5 वर्षों की पूर्ण बहुमत की मोदी जी की सरकार राष्ट्र सर्वोपरि के अपने प्रतिपक्षी प्रतिबद्धताओं को सत्ता के दौर में नये आयाम प्रदान कर  इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित करने में सफल रही है। परंतु आज की मीडिया और इंटरनेट की सबसे बडी विडंबना..कंटेंट को अगर आप कुदेरना प्रारंभ करेंगे तो पाऐंगे कि एक षडयंत्र के तहत हमारे इतिहास और मौलिक भारत के संस्कारों से छेड़छाड़ कर आपको नकारात्मकता की ओर ले जाने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत एक अभियान चलाया जा रहा है जो किसी के लिए सही नहीं है। उससे भी बडी विडंबना तो इन सबों पर सरकार का हस्तक्षेप या कर्न्टोल ना होना भी है।

भगवान से ना डरो तो चलेगा।

लेकिन कर्मो से जरूर डरना।।

क्योंकि किए हुए कर्मो का फल तो….

भगवान को भी भोगना पड़ता है।।

                                                                                                                                                                                  अश्वनीकुमार सिंह

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